Posts

Showing posts with the label Monk

व्यर्थ की नए अर्थों में तलाश...

Image
आकाश अपने फैले खुले दो हाथ के साथ पुकार रहा था और ठंडी हवा बारिश के साथ पुकार रही थी मानों   कह रही हो चलो तुम्हें ले चलूँ   अपने साथ   उस एकांत में जहाँ कभी बुद्धिस्ट अपना ज्ञानार्जन करते थे। शहरों और शोर   से दूर हरियाली के बीच एकांत   में। हाँ , इसी एकांत को तो खोज रहे थे वे लोग जो मनुष्य को पूर्णता की ओर   ले जाते है।            जिंदगी की इस भाग दौड़ , नौकरी की परेशानी , कमाते रहने और पेट पालने   की चिंता के बीच इस तरह का एकांत मन को   एक सुकून देता है। अपने आप को समझने और खुले तौर   पर सोचने की आज़ादी भी। परन्तु हम कहाँ कर पाते हैं ये सब। सिर्फ़ सोचना भर तो कतई पर्याप्त नहीं होता। अपने इस सोचे हुए को रचा जाना भी एक कला है। और शायद इसलिए ये एक कठिन काम है। उस सोचे हुए को रच कर अपनी दुनिया बनाना वाकई असंभव नहीं तो कठिन ( दुःसाध्य ) काम है। जब आप अपने सोचे हुए और रचे हुए को तोड़ पाने का साहसिक कार्य करते है तब आप कुछ नया रच पाते है।               वक़्त शायद धीरे - धीरे उसी औ...