कविताएँ
एक स्वप्न कल रात देखा था एक स्वप्न झकझोर गया था भीतर तक तय नहीं कर पाया , क्या था आखिर भ्रम या कुछ और... ज़िन्दगी की इस भागदौड़ में आते भी रफ्तार से हो। और चले जाते हो समझ आने के पहले ही। कहाँ जाते हो तुम , किसी और कि नींद में या फिर वहाँ, जहाँ से तुम कभी लौट ना सको। कभी-कभी आराम भी कर लिया करो , किसी की आँखों में। किसी की आँखों में रह लेने से खत्म नहीं होंगे तुम। तुम्हारा टूटना भी एक अजीब-सी बेचैनी देता है मुझे। तुम्हारा चले जाना मेरे एक हिस्से का चले जाना है। रुका करो इन आँखों में क्योंकि आँखें खाली नहीं होती इनमें आँसू आ जाते है। और रुकना भी एक ज़रूरी प्रक्रिया है, इस अनंत ब्रह्मांड की। ' या ' तथा ' और ' जब ' या ' तथा ' और ' कि लड़ाई होती है हमेशा आज के संदर्भ में ' या ' की ही जीत होती है पहले तुम ' और ' मैं हुआ करते थे अब हमेशा तुम ' या ' मैं होते हैं। इस ' या ' ने तुम्हारे और मेरे बीच आकर हमारा अस्तित्व ही खत्म कर दिया है। तुम पहले तुम थी मैं पहले मैं था ' तुम ' औ...